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SUMMARY:कृष्ण अष्टमी (Uposath Day)
DESCRIPTION:भगवान बुद्ध के समय में उनके मार्ग पर चलने वाले अष्टमी के दिन अष्टांग उपोसथ शील धारण करते थे एवं अपने जीवन में अप्रमाण पुण्य जमा करते थे। यह उपोसथ शील अत्यंत उत्तम एवं निर्मल है। इसे पालन करने से मन में प्रसन्नता जागती है एवं शोक दूर होता है। अरहन्त मुनि लोगों का अनुसरण करते हुए यह उपोसथ शील पालन किया जाता है।
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SUMMARY:पूर्णिमा (Uposath Day)
DESCRIPTION:इस पूर्णिमा के दिन ये विशेष घटनाएँ घटित हुई थी \n\nसम्राट अशोक की पुत्री अरहन्त संघमित्रा भिक्षुणी के द्वारा बोधिवृक्ष को श्रीलंका में लाना
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SUMMARY:शुक्ल अष्टमी (Uposath Day)
DESCRIPTION:भगवान बुद्ध के समय में उनके मार्ग पर चलने वाले अष्टमी के दिन अष्टांग उपोसथ शील धारण करते थे एवं अपने जीवन में अप्रमाण पुण्य जमा करते थे। यह उपोसथ शील अत्यंत उत्तम एवं निर्मल है। इसे पालन करने से मन में प्रसन्नता जागती है एवं शोक दूर होता है। अरहन्त मुनि लोगों का अनुसरण करते हुए यह उपोसथ शील पालन किया जाता है।
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DESCRIPTION:भगवान बुद्ध के समय में उनके मार्ग पर चलने वाले अमावस्या के दिन अष्टांग उपोसथ शील धारण करते थे एवं अपने जीवन में अप्रमाण पुण्य जमा करते थे। यह उपोसथ शील अत्यंत उत्तम एवं निर्मल है। इसे पालन करने से मन में प्रसन्नता जागती है एवं शोक दूर होता है। अरहन्त मुनि लोगों का अनुसरण करते हुए यह उपोसथ शील पालन किया जाता है।
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DESCRIPTION:भगवान बुद्ध के समय में उनके मार्ग पर चलने वाले अष्टमी के दिन अष्टांग उपोसथ शील धारण करते थे एवं अपने जीवन में अप्रमाण पुण्य जमा करते थे। यह उपोसथ शील अत्यंत उत्तम एवं निर्मल है। इसे पालन करने से मन में प्रसन्नता जागती है एवं शोक दूर होता है। अरहन्त मुनि लोगों का अनुसरण करते हुए यह उपोसथ शील पालन किया जाता है।
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SUMMARY:पूर्णिमा (Uposath Day)
DESCRIPTION:इस पूर्णिमा के दिन ये विशेष घटनाएँ घटित हुई थी \n\nभगवान बुद्ध के द्वारा साठ अरहन्त भिक्षुओं को धर्मदूत के रूप में लोकजन के कल्याण हेतु धर्म प्रचार के लिए आदेश देना\nअरहन्त सारिपुत्त भन्ते जी का परिनिर्वाण\nउरुवेला (बोधगया) के तीन जटिलों को दमन करने के लिए भगवान बुद्ध का उरुवेला में आगमन
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DESCRIPTION:भगवान बुद्ध के समय में उनके मार्ग पर चलने वाले अमावस्या के दिन अष्टांग उपोसथ शील धारण करते थे एवं अपने जीवन में अप्रमाण पुण्य जमा करते थे। यह उपोसथ शील अत्यंत उत्तम एवं निर्मल है। इसे पालन करने से मन में प्रसन्नता जागती है एवं शोक दूर होता है। अरहन्त मुनि लोगों का अनुसरण करते हुए यह उपोसथ शील पालन किया जाता है।
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DESCRIPTION:भगवान बुद्ध के समय में उनके मार्ग पर चलने वाले अष्टमी के दिन अष्टांग उपोसथ शील धारण करते थे एवं अपने जीवन में अप्रमाण पुण्य जमा करते थे। यह उपोसथ शील अत्यंत उत्तम एवं निर्मल है। इसे पालन करने से मन में प्रसन्नता जागती है एवं शोक दूर होता है। अरहन्त मुनि लोगों का अनुसरण करते हुए यह उपोसथ शील पालन किया जाता है।
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DESCRIPTION:इस पूर्णिमा के दिन ये विशेष घटनाएँ घटित हुई थी \n\nवर्षावास का पवारण दिवस\nभगवान बुद्ध का तावतिंस देवलोक से धरती पर संकिस्सा नामक स्थान पर पधारना\nअरहन्त सारिपुत्त भन्ते जी को प्रज्ञावान भिक्षुओं में अग्र पद की प्राप्ति इसी पूर्णिमा को हुई थी
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DESCRIPTION:भगवान बुद्ध के समय में उनके मार्ग पर चलने वाले अमावस्या के दिन अष्टांग उपोसथ शील धारण करते थे एवं अपने जीवन में अप्रमाण पुण्य जमा करते थे। यह उपोसथ शील अत्यंत उत्तम एवं निर्मल है। इसे पालन करने से मन में प्रसन्नता जागती है एवं शोक दूर होता है। अरहन्त मुनि लोगों का अनुसरण करते हुए यह उपोसथ शील पालन किया जाता है।
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DESCRIPTION:भगवान बुद्ध के समय में उनके मार्ग पर चलने वाले अष्टमी के दिन अष्टांग उपोसथ शील धारण करते थे एवं अपने जीवन में अप्रमाण पुण्य जमा करते थे। यह उपोसथ शील अत्यंत उत्तम एवं निर्मल है। इसे पालन करने से मन में प्रसन्नता जागती है एवं शोक दूर होता है। अरहन्त मुनि लोगों का अनुसरण करते हुए यह उपोसथ शील पालन किया जाता है।
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DESCRIPTION:इस पूर्णिमा के दिन ये विशेष घटनाएँ घटित हुई थी \n\nभिक्षुणी संघ का आरंभ
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DESCRIPTION:भगवान बुद्ध के समय में उनके मार्ग पर चलने वाले अष्टमी के दिन अष्टांग उपोसथ शील धारण करते थे एवं अपने जीवन में अप्रमाण पुण्य जमा करते थे। यह उपोसथ शील अत्यंत उत्तम एवं निर्मल है। इसे पालन करने से मन में प्रसन्नता जागती है एवं शोक दूर होता है। अरहन्त मुनि लोगों का अनुसरण करते हुए यह उपोसथ शील पालन किया जाता है।
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DESCRIPTION:भगवान बुद्ध के समय में उनके मार्ग पर चलने वाले अष्टमी के दिन अष्टांग उपोसथ शील धारण करते थे एवं अपने जीवन में अप्रमाण पुण्य जमा करते थे। यह उपोसथ शील अत्यंत उत्तम एवं निर्मल है। इसे पालन करने से मन में प्रसन्नता जागती है एवं शोक दूर होता है। अरहन्त मुनि लोगों का अनुसरण करते हुए यह उपोसथ शील पालन किया जाता है।
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DESCRIPTION:इस पूर्णिमा के दिन ये विशेष घटनाएँ घटित हुई थी \n\nप्रथम धम्म संगीति का आरंभ अगस्त महीने के पूर्णिमा से हुआ था\nभगवान बुद्ध का अग्र सेवक आनन्द भन्ते जी का अर्हत्व पाना
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DESCRIPTION:भगवान बुद्ध के समय में उनके मार्ग पर चलने वाले अष्टमी के दिन अष्टांग उपोसथ शील धारण करते थे एवं अपने जीवन में अप्रमाण पुण्य जमा करते थे। यह उपोसथ शील अत्यंत उत्तम एवं निर्मल है। इसे पालन करने से मन में प्रसन्नता जागती है एवं शोक दूर होता है। अरहन्त मुनि लोगों का अनुसरण करते हुए यह उपोसथ शील पालन किया जाता है।
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SUMMARY:पूर्णिमा (Uposath Day)
DESCRIPTION:इस पूर्णिमा के दिन ये विशेष घटनाएँ घटित हुई थी \n\nसिद्धार्थ बोधिसत्व का तुषित देवलोक से देवी महामाया के गर्भ में प्रवेश\nसिद्धार्थ बोधिसत्व का मुक्ति हेतु गृहत्याग\nभगवान बुद्ध के द्वारा वाराणसी में दस हजार चक्रवालों को कम्पित करते हुए पंच भिक्षुओं को प्रथम उपदेश (धम्मचक्कप्पवत्तन सूत्र) का प्रवचन करना\nराहुल कुमार का जन्म\nभगवान बुद्ध सहित पंच भिक्षुओं का प्रथम वर्षावास वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाय में (वर्तमान सारनाथ)\nभिक्षुओं के वर्षावास का आरंभ दिवस
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SUMMARY:शुक्ल अष्टमी (Uposath Day)
DESCRIPTION:भगवान बुद्ध के समय में उनके मार्ग पर चलने वाले अष्टमी के दिन अष्टांग उपोसथ शील धारण करते थे एवं अपने जीवन में अप्रमाण पुण्य जमा करते थे। यह उपोसथ शील अत्यंत उत्तम एवं निर्मल है। इसे पालन करने से मन में प्रसन्नता जागती है एवं शोक दूर होता है। अरहन्त मुनि लोगों का अनुसरण करते हुए यह उपोसथ शील पालन किया जाता है।
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SUMMARY:अमावस्या (Uposath Day)
DESCRIPTION:भगवान बुद्ध के समय में उनके मार्ग पर चलने वाले अमावस्या के दिन अष्टांग उपोसथ शील धारण करते थे एवं अपने जीवन में अप्रमाण पुण्य जमा करते थे। यह उपोसथ शील अत्यंत उत्तम एवं निर्मल है। इसे पालन करने से मन में प्रसन्नता जागती है एवं शोक दूर होता है। अरहन्त मुनि लोगों का अनुसरण करते हुए यह उपोसथ शील पालन किया जाता है।
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SUMMARY:कृष्ण अष्टमी (Uposath Day)
DESCRIPTION:भगवान बुद्ध के समय में उनके मार्ग पर चलने वाले अष्टमी के दिन अष्टांग उपोसथ शील धारण करते थे एवं अपने जीवन में अप्रमाण पुण्य जमा करते थे। यह उपोसथ शील अत्यंत उत्तम एवं निर्मल है। इसे पालन करने से मन में प्रसन्नता जागती है एवं शोक दूर होता है। अरहन्त मुनि लोगों का अनुसरण करते हुए यह उपोसथ शील पालन किया जाता है।
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SUMMARY:पूर्णिमा (Uposath Day)
DESCRIPTION:इस पूर्णिमा के दिन ये विशेष घटनाएँ घटित हुई थी \n\nश्रीलंका में भगवान बुद्ध के धर्म को स्थापित करने हेतु अरहन्त महेन्द्र भन्ते जी श्रीलंका के अनुराधपुर में मिहिन्तले स्थान पर आगमन\nश्रीलंका के राजा देवानंपियतिस्स सहित 40\,000 लोगों को अरहन्त महेन्द्र भन्ते जी के द्वारा चुल्लहत्थिपदोपम सूत्र का धर्म प्रवचन करना
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DESCRIPTION:भगवान बुद्ध के समय में उनके मार्ग पर चलने वाले अमावस्या के दिन अष्टांग उपोसथ शील धारण करते थे एवं अपने जीवन में अप्रमाण पुण्य जमा करते थे। यह उपोसथ शील अत्यंत उत्तम एवं निर्मल है। इसे पालन करने से मन में प्रसन्नता जागती है एवं शोक दूर होता है। अरहन्त मुनि लोगों का अनुसरण करते हुए यह उपोसथ शील पालन किया जाता है।
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DESCRIPTION:इस पूर्णिमा के दिन ये विशेष घटनाएँ घटित हुई थी \n\nसिद्धार्थ बोधिसत्व का मनुष्य लोक में आगमन (जन्म)\nसिद्धार्थ बोधिसत्व की बुद्धत्व प्राप्ति (सम्बुद्धत्व)\nभगवान बुद्ध का महापरिनिर्वाण\nबुद्धत्व के पश्चात् कपिलवस्तु में आगमन एवं शाक्यों के अहंकार को खंडित करने हेतु ‘यमक महाप्रातिहार्य’ नामक अद्भुत सिद्धि का प्रदर्शन\nबुद्धत्व के 8 वर्ष पश्चात् तीसरी बार श्रीलंका में आगमन\nश्रीलंका के श्रीपाद पर्वत के शीखर पर भगवान बुद्ध के द्वारा नीलमणि में श्रीचरण के पदचिन्ह को स्थापित करना\nभगवान बुद्ध का अग्र सेवक अरहन्त आनन्द भन्ते जी का परिनिर्वाण\nभगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के दिन ही राजकुमार विजय का श्रीलंका द्विप में आगमन एवं सिंहली जाति की शुरुआत
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